रविवार, अगस्त 19, 2012

भारतीय संस्कृति में श्राद्व कर्म की गरिमा----


भारतीय संस्कृति में श्राद्व कर्म की गरिमा----
 
भारतीय हिन्दु संस्कृति मे तीन प्रकार के ऋणों का उल्लेख है- पितृ ऋण, ऋशि ऋण व देव ऋण। षास्त्र विहित कर्मो की पुजा, वत्र,उपवासादि से देव ऋण से मुक्त होते है। पितृ ऋण मे मनुश्य श्राद्व, पितृ पूजन करने से मुक्त होता है। तिलयुक्त जल के तर्पण,ब्राह्यण भोजन, अग्नि करण, पिण्दान ये श्राद्व के अंग है। श्राद्व करने से पितरो से सर्व सुखो के आषीर्वाद की प्राप्ति होती है।

भारतीय जन जीवन और संस्कृति मे पिता-पुत्र का रिष्ता मात्र इस संसार मे जीवित रहने तक ही सीमित नही है पर यह अटूट है और मृत्यु परान्त भी बना रहे इसके लिए श्राद्व कर्म का प्रावधान है। पुत्र न केवल पितृ पक्ष अपितु मातृपक्ष के भी तीन-तीन पुर्व पूरूशो के निमित श्राद्व करता है। मार्कण्डेय पुराण मे ऐसा कहा गया है कि “श्राद्व मे जो कुछ दिया जाता है वह पितरों द्वारा प्रयुक्त होने वाले उस भोजन मे परिवर्तित हो जाता है जिसे वे कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्वान्त के अनुसार नए षरीर के रूप् मे पाते है।”

पितृ श्राद्व दो प्रकार के है (1) प्रत्याब्घिक श्राद्व और (2)महालय श्राद्व। प्रत्याब्धिक श्राद्व मृत्यू तिथी पर प्रति वर्श किया जाना व महालय श्राद्व आशाढ़ पूर्णिमा के पांचवा पक्ष याने आष्विन माह का कृश्ण पक्ष के पन्द्रह दिन मे उसी तिथि (मृत्यू तिथि) को किया जाता है। यह माना जाता है कि इस पक्ष मे पितर लोग उत्सव मनाते है और आकाष से आकाष गंगा मार्ग द्वारा आगमन करते है। इस पक्ष मे केवल माता-पिता के पक्ष के लिए नही अपितु अन्य रिष्तेदारो के लिए भी श्राद्व करने का विघान षास्त्रो मे मिलता है। प्रष्न उठता है कि पुनर्जन्म की स्थिति मे किस प्रकार ब्राह्यण भोजन कराने से पितरों की तृप्ति होती है ? इसके उत्तर मे श्री नन्द पएिडत का कथन है “जिस प्रकार के बछड़ा अपनी माता को फैली हुई अन्य गायों मे से चुन लेता है उसी प्रकार से श्राद्व में कहे गये मंत्र प्रदत्त भोजन को पितरों तक ले जाते है”।

ब्रह्य पुराण में उल्लेख है कि “जो उचित काल,पात्र एवं स्थान के अनुसार षास्त्रानु मोदित विधि द्वारा पितरो का लक्ष्य करके ब्राह्यणों को दिया जाता है वह श्राद्व निर्मित होता है। पितरों को उददेष्य करके (उनके कल्याण के लिए श्रद्वापूर्वक किसी वस्तु, द्रव्य, वस्त्र का त्याग किया जाता है वह उस प्राणी (पितृ) के लिए माना जाता हैं।
श्राद्व कर्ता को श्राद्व कर्म मे आवष्यक रूप से जिनका श्राद्व किया जा रहा है उनके नाम व गोत्र का उच्चारण करना चाहिए। श्राद्व कर्म के लिए तर्पण इत्यादि दक्षिणामुख होकर ढालू भूमि पर श्राद्वकर्म करने का विघान है इसलिए नदी किनारा, तालाब किनारा, व अन्य ऐसा स्थान उचित होता है। तर्पण के जल मे काले तीलो का होना आवष्यक है। अप्रसंग्य जनेउ करते हुए पात्र में काले तिल जौ पानी मै डालकर हथेली के अंगुठे एवं तर्जनी के पास कुषा रखते हुए अंगूठे व तर्जनी मे मघ्य भाग से तीन अंजली दी जाती है। पुत्र के द्वारा श्राद्व दक्षिणांमुख होकर अपरान्त में सूर्यास्त के पहले श्राद्व कर्म किया जाना चाहिये। महर्शि मनु का मत है कि “पुत्र के उत्पन्न होने से व्यक्ति को लोको की प्राप्ति, पौत्र उत्पन्न होने से अमरता व प्रपौत्र से सूर्यलोक की प्राप्ति करता है। इसके पीछे निर्बाघ गति से वंष परंपरा चलते रहना है।

श्राद्व मे जहां तक भोजन कराने का प्रष्न है - श्राद्व के पूर्व के दिन भोजन जिमित उच्च कोटी के विद्वान ब्राह्यणों को निमंत्रण देना चाहिये जो कि एक,तीन,पांच,सात आदि विशम संख्या मे हो। ब्राह्यण मौन रह कर भोजन करे व कर्ता क्रोघ न करे, प्रसन्नचित होकर भोजन परूसे। श्राद्व में स्वच्छता रखना अनिवार्य है, भोजन मे तिल मिश्रित व्यन्जन हो व स्वच्छ आसन पर भोजन करें। भोजन कर कुछ भाग आकाष में उड़ने वाले पक्षियों हेतु,धरातल पर विचरने वाले पषुओं हेतु, सम्मुच मे रहले वाले जलचरों व पाताल लोक जाने वाले कीड़े-मकोड़ों हेतु भी निकाल कर रखना चाहिए। माना जाता है कि इन दिनो काग (कौआ) को भोजन देना भी उपयुक्त है।

श्राद्व पक्ष में पितृ पूजन से पितरांे द्वारा कर्ता की आयु, पुत्रयष स्वर्ग, कीर्ति पुश्टिवाला, श्री सौख्य तथा घन-घान्य होने का आषीर्वाद मिलता है। यह अपने पूर्वजों के पुण्य स्मरएा का दिन होता है। अतः हर व्यक्जि को अपने माता-पिता व अन्य धनिश्ठ सम्बन्धियों का श्राद्व करना चाहिये। पूर्वजो के प्रति श्रद्वा अर्पण का अवसर और उनके ऋण से मुक्ति का उपाय है। अज्ञानवष कोई पूर्वजो की मृत्यु तिथि याद न रख पाए तो आष्चिन कृश्ण पक्ष अमावस्या को ऐसा श्राद्व किया जाना शास्त्र युक्त है। इस प्रकार पितरों को मोक्ष दिखाया जा सकता है।     

Pt. Pradeep Upadhyay,
                                                                        Shree Durga Jyotish Karyalaya,
                                                                        Jodliya Mandir, Luhar Mohalla,
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दैनिक जीवन मे उपयोगी सरल टोटके


दैनिक जीवन मे उपयोगी सरल टोटके

धन लाभ के लियेः-
(1)  षुक्ल पक्ष के गुरूवार को पीले रंग का मीठे चावल बनाकर गरीबो मे बांटने से धन लाभ होगा।
(2)  रामायण के इस मंत्र का तुलसी की माला से नियमित जाप करने से धन का आगमन बढ़ता है।
जिमि सरिता सागर मंहु जाई
 जद्यपि ताहि कामना नौहि
    जिमि सुख सम्पति बिनाहि बोलाएं
 धरमषील महि जाई समाए
(3)  इमली की टहनी को काटकर धर गल्ले या जेब मे रखा जाये तो धन की वृद्वि होती है तथा धर में बरकत रहती है।
(4)  षुक्ल पक्ष के सोमवार के दिन एक मुठठी साबुन बासमती चावल बहते हुए ज लमे श्री महालक्ष्मी का स्मरण करते हुए बहा देना चाहिए।

व्यापार उन्नति एवं वृद्वि के लियेः-
(1)  मंगलवार को ग्यारह पीपल के पतो पर लाल चदंन से राम-राम लिखकर हनुमान जी के मन्दिर मे चढ़ाये।
(2)  पूर्णमासी के दिन जल मे थोड़ा दूध व चावल मिलाकर चन्द्रमा को अध्र्य दें तथा अपने व्यसाय की उन्नती के लिये प्रार्थना करें।
(3)  सर्वासिद्वि योग मे अपने गल्ले मे कालीगुंजा के कुछ दाने श्रीं श्रीं श्रीं मंत्र का जाप करते हुए रखे।
(4)  अनुराध नक्षत्र में नीबूं क ेपते लाकर पास रखने से व्यापार मे अच्छा लाभ होता है।

शीघ्र विवाह के लियेः-
(1)  दुर्गासप्तषती का नित्य पाठ करना भी वैवाहिक विध्न-बाधाओं को अवष्य दुर करता है।
(2)  कन्या की उम्र अधिक है चाहकर भी षादी नही हो पा रही हो तो कुवांरी कन्या का षयनकक्ष वायव्य कोण वाले कमरे में बदल दे षीध्र विवाह हो जायेगा।

सुखी दाम्पत्य जीवन के लियेः-
(1)  यदि पति-पत्नी मे परस्पर तू-तु मै-मै एवं वाकयुद्व होता हो तो ऐसे जातक को बुधवार के दिन कुछ समय के लिये मौनवत करना चाहिये।
(2)  पति-पत्नी मे विवाद हो तो दोनो को कांसे के बर्तन मे धी लेकर जिस स्थान पर अखण्ड ज्योति जलती हो उसमे डालना चाहिये।

सुखी जीवन के लियेः-
(1)  मुख्यद्वार के पदे के नीचे कुछ धुधंरू बांध दे इसके संगीत से धर मे प्रसन्नता का वातावरण रहेगा।
(2)  प्रतिदिन सवेरे थोड़ा सा दुध और पानी मिलाकर धर मे पोछा लगाने से मानसिक षांति एवं सुख मिलेगा।

दिनभरशुभ  हो इसके लियेः-
(1)  सोमवार को चदंन का तिलक लगाये।
(2)  मंगलवार को थोड़ा सा साबुत धनिया खाये।
(3)  बुधवार को गुड़ अथवा पान खाये।
(4)  गुरूवार को राई के दान खाने चाहिये।
(5)  षुक्वार के दिन चावल तथा दही का भोजन करें।
(6)  षनिवार के दिन तेल से बनी वस्तु का सेवन करना लाभदायक है।

दिशाशुल निवारण के लियेः-
(1)   दिशाशुल  में जहां तक संभव हो यात्रा नही करनी चाहिए परन्तु यात्रा अनिवार्य हो तो निम्न उपाय अवश्य  करने चाहिए-----
---रविवार को यात्रा करनी हो तो धी चाटकर जाना चाहिये।
-----सोमवार के दिन दूध पीकर यात्रा करनी चाहिये।
----मंगलवार को गुड़ खाकर।
---बुधवार के दिन तिल खाकर।
----गुरूवार को दही खकर यात्रा करनी चाहिये।
----शुक्रवार के दिन जौ खाकर।
---शनिवार के दिन यदि यात्रा करनी हो तो उड़द का दान देना चाहिये।
 
 


                                                                        Pt. Pradeep Upadhyay,
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आवश्यक पंचाग अभिज्ञान ---


आवश्यक पंचाग अभिज्ञान ---

सर्वसाधारण हेतु पंचांग अभिज्ञान अवलोकन विधि-भारतीय पच्चाग्ड़ के प्रमुख 5 अंग होते है अतः पच्चाग्डसंज्ञक कहलाता है, यथा-तिथिवार्रष्च नक्षंत्र योगः करणमेव च। 
एतैः पंचभिरंगै संयुतं पच्चाग्उ़माख्याते।।
एवमेव प्रकारन्रेऽपिसूत्रम- तिथिर्वासरनक्षत्रे योगः करणमेव च इति पच्चाग्ड़माख्यातं व्रतपर्वनिदर्षकम।। 
तिथि,वार,नक्षत्र, योग तथा करण ये पांच विभाग है।

प्रथम 1 भाग तिथि तत्वः -----
सूर्यचन्द्रयोर्या स्थितिः सा एवं तिथिः अमावस्या के अन्त पर सूर्य चन्द्र दोनो एक समान राषि अषं पर रहते है।, तथा षीध्र गतिमान चन्द्रमा का जब सूर्य से क्रकिम 12 अंषो का अन्तर सिद्व होता है, उस कालांष उन्तरांष को प्रतिदिता, 12 से 24 अंषान्तर को द्वितिया एवमेव क्रमषः 24 से 36 अंषान्तर के बनते तृतिया तिथि सिद्व होकर अग्रिम क्रमिक रूप से 12-12 अंष पर तिथि क्रम वृद्विषील रहते 168 से 180 अंषान्तर पर पूर्णिमा का स्वरूप् प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। तथा 180 अंष के अन्त मे 167 अंष तक 12 अंष न्यूनसन्तर होते कृश्णपक्ष की द्वितिया तिथि इसी प्रकार न्यूनान्तर होत-होते 12 से 0 षून्य अंषान्तर पर 30 अमावस्या तिथि का स्वरूप बनेगा। प्रतिपदा - द्वितीया - तृतीया - चतुर्थी - पंचमी - शश्ठी - सप्तमी -  अश्टमी - नवमी - दषमी - एकादषी - द्वादषी - त्रयोदषी - चतुर्दषी और पूर्णिमा 15 षुक्ल पक्ष 1 से 15 पूर्णिमा तक पुनः प्रतिपदा से क्रमषः चतुर्दषी अमावस्या 30 संज्ञक के कृश्णपक्ष की तिथि मानी जाती है। पक्ष संबा 1 चान्द्र मास में 2 पक्ष होते है, पहला षुक्ल पक्ष 1 से 15 तक पुनः कृश्णपक्ष 1 से 30 अमावस्था तिथि तक 1 द्वितीय 2 भाग वारों को विज्ञान। एक सूर्योदय से द्वितीय सूर्योदय के पूर्वसमय को-वार माना है। वार प्रवृति सूर्योदय से ही क्रमषः रवि - सोम - मंगल - बुध - गुरू - षुक् - षनि आदि 7 वार क्रमषः चलते है। अंग्रेजी दिनांक अद्र्वरात्रि 120 से बदल जाती है, परन्तु वार प्रवृति सूर्योदय से ही मान्य होती है।

तिथि क्षयवृद्वि सूत्र -
1 तिथि का मान 2 ----
सुर्योदय मे स्पर्ष करे तो वह वृद्वि तिथि तथा 1 ही तिथि का मान प्रथम सूर्योदय से द्वितीय पूर्व ही पूरक हो जावे तो वह क्ष तिथि बनती है। यदि नियामक क्षय वृद्वि स्थिति का-नक्षत्र -योगो के उपकरणों हेतु भी मान्य रहता है। तृतीय 3 भाग-नक्षत्रनिर्णय सम्पूर्ण आकाष 360 अंषो का गणनामत मान्य है, तथा समस्त भच्रक की 27 भागो से विभक्त करने से 13 अंष 20 कला अर्थात 800 कला का 1 क्षेत्र अष्विन्यादि रवती प्र्यन्त 27 नक्षत्रो को भाग मान्य है। 
नक्षरतितीति नक्षत्राः---
 ये नक्षत्र स्थिर बिन्दु का मान के है, जिस दिन समय को चन्द्रमा पृथ्वी से जिस नक्षत्रपुच्च मे दिखे उस दिन पच्चाग्ड़ मे वही नक्षत्र रहता है। अष्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगषिरा, आर्दा, पुनर्वसु, पुश्य, आष्लेशा, मधा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराशढ़, श्रवण, घनिश्ठा, षतभिशा, पूर्वाभद्रपद, उत्तराशाढ़, रेवती, ये 27 नक्षत्र क्रमणः है। इनमे अभिजित का मान उत्तराशाढ़ नक्षत्र की अन्तिम 15 धटी और श्रवण प्रारम्भ की 4 घटी का मान अभिजित नक्षत्र का है। 1 नक्षत्र मे 4 चरण होते है, प्रति चरण 3 अंष 20 कला तथा 1 राषि मे 9 चरण का मानक बनता है। 

चतुर्थ 4 भाग-----
योगो के नाम-सुर्य चन्द्र गति मे 13 अंष 20 कला का अन्तर होने से 1 योग का कालांष बनता है अर्थात सुर्य की माघ्यमिक गति दैनिक 1 अंष है और चन्द्रमा 13 अंष 20 कलादि, जिस समय ये दोनो मिलकर औसतम 13 अंष  20 कला की दुरी आकाष मे पार करेगें। उस कालाषं का एक योग नाम बनेगा। योग भी 27 होते है तथा विश्कुम्भ , प्रीति, आयुश्मान, सौभाग्य, षोभन, अतिगड़, सुकर्मा, धृति, षूल,गण्ड, वृद्वि,घ्रुव,व्याघात,हर्शण,वज, सिद्वि, व्यपिपात,वरियान, परिघ, षिव, सिद्विख् साघ्य,षुभ,षुक्ल,बह्म, ऐन्द्र, वैधृति ये 27 योग है।

पंचम 5 भाग करण----
 तिथि के आधे भाग को कारण कहते है, तिथियो के सूक्ष्म प्रभाव जानने के लिऐ प्रत्येक तिथि के 2 ळााग मान्य किये है यथा-तिथ्यर्थ करणं स्यात, प्रत्येक भाग की करण संज्ञा है, सुर्य चन्द्रयोर्मघ्र्य शट अंषांतरे करणमेक बव, बालव-कौलव-तैतिक- गर वाणिज-विश्टि (भढ़ा) ये 7 चलसंज्ञक तथा षकुनि-चतुश्पद-नाग -किस्तुध्य ये 6 स्थिर करण है। एवं भारतीय पंचाग के पांच तत्व। 



Pt. Pradeep Upadhyay,
                                                                        Shree Durga Jyotish Karyalaya,
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दान व दान के प्रकार ----


दान व दान के प्रकार ----

भारतीय संस्कृति मे दान का महत्व सर्वादिक बताया गया है हमारे यहाँ जप तप दान यज्ञ का बड़ा भारी प्रभाव है। जब औशधीयों द्वारा किसी बीमार व्यक्ति की व्याधी समाप्त नही होती तो दवा के साथ दुआ व दान की गरिमा को अधिक सफल माना गया है। हमारे यहाँ ग्रहों द्वारा पीडि़त व्यक्ति को पंडि़त लोग दान का सहारा देकर रोग मुक्ति के उपाय सुझाते रहे है गोदान,कन्यादान आदि को हमारे षास्त्रों ने दान की श्रेश्ट श्रेणी में रखा है आईये कुछ एैसे दान भी है जिन्हें हम समाज के हित में करने का बीड़ा उठावें।
1. रक्तदान:- लोगो ने रक्तदान को महादान की संबा दी है व “सारे दान एक बार रक्त दान बार-बार” कहा है।
2. औशघीदानः- अस्वस्थ व्यक्ति को स्वस्थ करने के लिए रोगी व असमर्थ लोगो को औशघी दिलाना श्रेश्ठ दान है।
3. आरोग्यदानः- किसी असहाय व्यक्ति को अपनी देख-रेख में रखकर उसका ईलाज व आपरेषन आदि करवाना। 
4. अंगदानः- रोगी का प्राण बचाने के लिए रक्त,माँस या किसी अंग का दान देना।
5. नेत्रदानः- मरणोपरान्त अपने नैत्रों को किसी एैसे व्यक्ति हेतु दान कर जाना जो जन्मान्घ है व हमारे नेत्र दान से दुनिया की रोषनी देख सकें।
6. कायादानः- अपने षरीर से परोपकार के कार्य करना व निस्वार्थ कार्य करके पुण्योपार्जन किया जाय, लुले लगंड़े आदि अथवा किसी अनाथ व निराघार बालक को संरक्षण देना। कायादान दपने आप मे एक विषिश्ठ पुण्य है। किसी व्यक्ति के पास धन न हो साधन न हो, बुद्वि या वाचिक षक्ति न हो फिर भी वह षरीर द्वारा दुसरे की सेवा करें।
7.श्रमदानः- श्रम दान प्रायः सामुहिक कार्यो के लिए होता है। श्रमदान से कई तालाब,सड़क  बाॅध आदि का निर्माण करके ग्रामीण लोगो ने अपने कर्तव्य व ग्राम धर्म का परिचय दिया है।
8.समयदानः- व्यक्ति अपनी दिन चर्या मे से थोड़ा समय निकाल कर या ग्रीश्मावकाष या अन्य छुट्टीयों मे सत्कार्य के लिए अपना समय दे।
9.अभयदानः- सब दोनो मे अभयदान श्रेश्ट है बड़े-बड़े दानो का फल समय आने पर क्षीण हो जाता है लेकिन भयभीत प्राणी को अभयदान का फल कभी क्षीण नही होता।
10.आर्षीवाद दानः- हृदय से दिया गया आर्षीर्वाद फलदायी होता है बहु-सास को दैनिक प्रणाम करे तो मन वेमनस्य दूर होकर झगड़े कम होते है धर मे सुखषान्ति रहती है।
11. दयादानः- दयाधर्म का मूल हे, पाप मूल अभिमान,
तुलसी दया न छोडि़ये जब लग घट मे प्राण।।
जो गरीब का हित करे धन्य-धन्य वे लोग कहाँ सुदामा वापुरो कृश्ण मिताई योग, दया दि लमे रखिये, तू क्यो निरदय होय, सरई के सब जीव है कीड़ी कुन्जर सोय महापुरूशो ने कहा है-
छया के समान कोई धर्म नही, हिसां के समान कोई पाप नही, ब्रह्मचर्य के समान कोई व्रत नही व ज्ञान के समान कोई साधन नही, षान्ति के समान कोई सुख नही, ऋण के समान कोई दुख नही, ज्ञान के समान कोई पवित्र नही, ईष्वर के समान कोई इश्छ नही।
12.क्षमादाानः- क्षमा बड़न को चाहिए छोटेन को उत्पात,
कहा कवश्णु को धट गयो जो भृगूमारी लात,
क्षमा करने से मानसिक षान्ति मिलती है।
13.त्यागदानः- सारे सुख त्याग से मिलते है, दुसरो के अधिकार के लिए अपने अधिकार का त्याग करनो, दुसरो की इच्छा के लिए अपनी इच्छा त्याग करना, एैसा करने से निष्चय ही हमारा जीवन सफल होगा।

  जे तो को काँटा बुवै ताही तू फूल बोही तू फूल के फूल है वो को है तिरसुल त्याग से सयुक्त परिवार में रहकर संयुक्त परिवार के लिए त्याग करना, सयुक्त परिवार मे बाप-बेटा, सास-बहु, दवेरानी-जिठानी, भाई-बहन, पति-पत्नि, भाई-बहन, एक दुसरे के लिए त्याग करना संयुक्त परिवार एक अनमोल कवच है।
इसी श्रेणी के जीवन में कई दान है जिनसे हमारे जीव न मे सुख शांति का अनुभव किया जा सकता है। 
      

                                                                        Pt. Pradeep Upadhyay,
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