#भगवान_की_पूजा_में_जानने_योग्य_बातें
1. #घर में #पाठ_पूजा करने वालो को एक ही #मूर्ति की पूजा नहीं करके अनेक देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए ।
घर में पंचदेव पूजन में श्री गणेश माँ दूर्गा ज़ी ,भगवान शिव ,भगवान विष्णु व सूर्य देव की पूजा करना अच्छा रहता है . व आपका मुख उत्तरपूर्व दिशा की ओर तो बहुत अच्छा है ,तथा पंचोपचार पूजा क्रम हो ज्यादा अच्छा है 1.आवाहन 2.स्नान या देवताओ को जल के छीटे मारना 3.गंध तिलक लगाना.4.धूप दीपक जलाना 5.नैवेध (भोग ) चढ़ाना चाहिए l
2. दीपक को दीपक से जलाने से दरिद्र ओर रोग होता है l
3. यज्ञ, श्राद्ध ,व्रत,अनुष्टान ,जाप आदि करते समय सत्विक रहना चाहिए ,कम बोलें व झूठ नहीं बोलना चाहिए l
4. शालिग्राम की मूर्ति जितनी छोटी हो वह ज्यादा फलदायक है।
5. कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।
6. मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता हैं। पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए।
7. पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती है अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं।
8. तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं।
9. आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं। दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है।
10.देवताओं को अंगूठे से नहीं मले। चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें।
11. पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए।
12. भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें।
13. भगवान की आरती दोनों हाथों से करनी चाहिए l
14. लोहे के पात्र से भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें।
15. मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए। माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं। माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए।
16. जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें। तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए। माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए। ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए।
16. जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं। बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं।
17. एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।
18. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। (मन ही मन में )इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।
19. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।
20.संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषेध है ,आर्थात नहीं तोड़ना चाहिए l
21. पूजा पूर्ण होने पर अपनी क्रूटियों भूल चूक व अपराधों के लिए क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए ,तथा दंडवत प्रणाम् करना चाहिए l.