क्यों की जाती है परिक्रमा
परिक्रमा की जाती है क्योंकि देवमूर्ति के
आसपास दिव्य ओरा मंडल होता है और इस ओरा मंडल से
सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए हमें
परिक्रमा करनी चाहिए। मंदिर में लगातार भगवान
की पूजा और मंत्रों का उच्चारण होता रहता है,
जिसका असर सदैव वहां के वातावरण में बना रहता है।
शास्त्रों के अनुसार मंत्रों के उच्चारण मात्र से मन और वातावरण
की शुद्धि होती है,
पवित्रता बढ़ती है, ऊर्जा बढ़ती है,
नकारात्मक शक्तियां निष्क्रीय
हो जाती हैं। मंदिर के वातावरण से इन सब
फायदों को ग्रहण करने के लिए परिक्रमा अवश्य
करनी चाहिए।
हमेशा ध्यान रखें कि परिक्रमा सदैव दाएं हाथ
की ओर से ही प्रारंभ
करनी चाहिए, क्योंकि दैवीय शक्ति के
आभामंडल
की गति दक्षिणावर्ती होती है।
बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर
दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मंडल
की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य परमाणुओं में
टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है।
जबकि सीधे हाथ की ओर से
परिक्रमा करने पर वातावरण से ऊर्जा आसानी से
प्राप्त होती है।
सभी देवी-देवताओं
की परिक्रमा की संख्या अलग-अलग
बताई गई है जैसे-
- श्री गणेश की तीन
परिक्रमा ही करनी चाहिए। जिससे
श्री गणेश भक्त को रिद्ध-सिद्धि सहित
समृद्धि का वर देते हैं।
-
शिवजी की आधी परिक्रमा करने
का विधान है। शिवजी बड़े दयालु हैं वे बहुत जल्द
प्रसन्न हो जाते हैं और भक्त पर सब कुछ न्यौछावर कर देते
हैं। भोलनाथ मात्र आधी परिक्रमा से
ही प्रसन्न हो जाते हैं।
- माताजी की एक
परिक्रमा की जाती है। माता अपने
भक्तों को शक्ति प्रदान करती है।
- भगवान नारायण अर्थात् विष्णु की चार
परिक्रमा करने पर अक्षय पुण्य
की प्राप्ति होती है।
- एक मात्र प्रत्यक्ष देवता सूर्य की सात
परिक्रमा करने पर सारी मनोकामनाएं जल्द
ही पूरी हो जाती है।
- श्रीराम के परम भक्त पवनपुत्र
श्री हनुमानजी की तीन
परिक्रमा करने का विधान है।
भक्तों को इनकी तीन
परिक्रमा ही करना चाहिए।
ये भी ध्यान रखें...
परिक्रमा करते समय बीच-बीच में
रुकना नहीं चाहिए।
परिक्रमा वहीं पूरी होती है
जहां से परिक्रमा प्रारंभ की जाती है।
अधूरी परिक्रमा का पूर्ण फल प्राप्त
नहीं हो पाता है।
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सोमवार, मई 07, 2018
क्यों की जाती है परिक्रमा
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